कई राज्यों ने 16वें वित्त आयोग से करों में अपनी हिस्सेदारी को 41% से बढ़ाकर 50% करने की मांग की है। हालांकि राज्यों का यह आग्रह वाजिब है, लेकिन केंद्र सरकार की सीमित वित्तीय क्षमता के चलते यह मुश्किल हो सकता है।
राज्यों का कहना है कि केंद्र द्वारा लगाए गए उपकर और अधिभार (cess & surcharge) करों के बंटवारे से बाहर हैं, जिससे उन्हें वास्तविक हिस्सेदारी कम मिल रही है। अब चर्चा इस बात पर है कि बंटवारे की गई राशि के भीतर बंधी हुई (tied) राशि की तुलना में बिना शर्त (untied) अनुदानों को बढ़ाया जाए ताकि राज्यों को अपनी प्राथमिकताओं पर खर्च करने की अधिक आज़ादी मिले।
लेकिन इससे दो बड़ी चिंताएं हैं:
राज्यों की बढ़ती राजस्व घाटा समस्या – कई राज्य रोज़मर्रा के खर्चों के लिए कर्ज पर निर्भर हैं।
क्या अधिक "बिना शर्त" राशि गैर-उत्पादक खर्चों (जैसे मुफ्त बिजली या पानी) में ही चली जाएगी?
निष्कर्ष:
वित्त आयोग को इस बार केवल "राजस्व वितरण" नहीं, बल्कि "राजनीतिक प्राथमिकताओं" और "विकास की गुणवत्ता" के बीच संतुलन बैठाना होगा।
